मेरा नाम नरेश धीमान है। मैं कैथल शहर का रहने वाला हूँ जो करनाल और पटियाला के पास है। मैं आज आपके सामने मेरे बचपन की कुछ यादें ताज़ा कर रहा हूँ। मेरा जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहां मेरे माता पिता को मेरे जन्म के समय बहुत सी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। उनके पास अपना घर नहीं था। मेरे पिताजी एक राज मिस्त्री का काम करते थे। उन्होंने अपने खून पसीने की कमाई से न सिर्फ मुझे पढ़ाया बल्कि कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी। ये अलग बात है कि मैंने उनसे कभी कभार ही कुछ पैसे मांगे होंगे क्यूंकि रुपये पैसों का शौक़ मुझे शुरू से ही नहीं रहा। शायद भगवान ने मुझे ऐसा ही बनाया है। लेकिन कभी कभार जब मैं डैडी से 50 पैसे, 1 या 2 रुपये मांगता तो वो खुशी खुशी मुझे वो रुपये थमा देते। मुझे याद है कि मैं अपने डैडी को दोपहर का खाना देने साइकिल पर जाया करता था, उस समय वो भीषण गर्मी में मकान बना रहे होते थे। उन्हें काम करता देख मेरे मन में दया और करुणा के भाव जाग उठते थे। और मेहनत करने में आनंद की अनुभूति महसूस करना मैंने डैडी से सीखा। मैं ज़िन्दगी भर डैडी का उपकार नहीं भूल सकता और उसे चुकाने की तो मेरी कोई औकात भी नहीं है। उनकी एक खास बात यह भी है कि कभी मुझे या मेरे भाई को उन्होंने किसी काम के लिए नहीं कहा। वो बस हमें पढ़ लिखकर कामयाब होते देखना चाहते थे। और ये बात मैंने शुरू से ही महसूस भी की। मेरी मम्मी सफाई को लेकर इतनी समर्पित हैं कि आज भी अगर हम कोई काम कर दें तो उन्हें तसल्ली नहीं होती। वो बहुत मेहनती हैं और उन्होंने हमें पिताजी की तरह कभी किसी काम के लिए नहीं कहा बल्कि हम ( मेरा छोटा भाई और मैं) ही काम को तरस जाते थे। जैसे कपड़े धोना, झाड़ू लगा देना आदि। आज भी याद है कि जब भी मैंने कोई कपड़ा धोया तो मम्मी ने फिर से उसे दोबारा धो दिया करना। शायद इसका एक कारण यह भी रहा होगा कि हम अपनी पढ़ाई और आराम की और ध्यान दें। भले ही हम बहुत अमीर न हो लेकिन माँ बाप ने कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी। अभी के लिए यहीं विराम लेता हूँ , फिर और दिलचस्प कहानी आपके लिए लेकर हाज़िर हूंगा। तब तक के लिए सब को प्रणाम, रब राखा 🙏
Saturday, July 20, 2019
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